गीता में कर्म और फल की बात
गीता में पूरे मन से कर्म करने और फल की आसक्ति छोड़ने की बात साथ आती है। समझें कि रोज़मर्रा का काम भी भक्ति का भाव कैसे ले सकता है।
कदम 1
दोनों बातों को साथ पढ़ें
दूसरे अध्याय में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म की प्रेरणा केवल उसका फल न हो। साथ ही वे कर्म करते रहने को भी कहते हैं। चिंतन करने से पहले अंश की दोनों बातों को साथ पढ़ें।
कदम 2
कर्म में भक्ति का भाव देखें
आर्नल्ड के अनुवाद में कर्म करते रहने और परिश्रम करने का स्पष्ट आग्रह है। आगे कर्म को भक्ति और समभाव से जोड़ा गया है। काम को ध्यान और लगन से करना भी इसका हिस्सा है।
कदम 3
एक छोटा-सा चिंतन
अगर नौकरी के आवेदन का जवाब आने का इंतज़ार है, तो सोचकर देखिए: आवेदन तैयार करने में आपने क्या सावधानी बरती, और अब कौन-सा निर्णय दूसरे के हाथ में है? फिर आज का कोई एक उपयोगी काम चुन सकते हैं।
कदम 4
एक सवाल साथ रखें
परिणाम अभी तय नहीं है, फिर भी आज किस काम को मैं पूरी लगन दे सकता हूँ? इस सवाल पर मन ही मन सोचें या अपना उत्तर लिख लें।
जिन दिनों मेहनत के साथ अनिश्चितता भी हो, उन दिनों इस अंश को फिर पढ़ सकते हैं।