दिग्बल: कुंडली के स्थान और एक वैकल्पिक व्याख्या
दिग्बल के लिए यह अंश चार दिशाओं को कुंडली के चार स्थानों से जोड़ता है। टिप्पणी में निश्चित राशि-समूहों पर आधारित एक दूसरी व्याख्या भी दी गई है।
कदम 1
पहले मुख्य व्याख्या देखें
इस अंश में दिए गए कुंडली के स्थानों का उपयोग करें। यहाँ दिशाओं के नाम इसी कुंडली-परंपरा का हिस्सा हैं।
| दिशा | कुंडली में स्थान | बताए गए ग्रह |
|---|---|---|
| पूर्व | उदय / लग्न स्थान | बुध, गुरु |
| दक्षिण | दसवाँ स्थान | सूर्य, मंगल |
| पश्चिम | अस्त स्थान | शनि |
| उत्तर | चौथा स्थान | चंद्रमा, शुक्र |
कदम 2
एक छोटा उदाहरण
उदय स्थान पर गुरु होने से तालिका में गुरु के लिए दी गई स्थिति मिलती है। अस्त स्थान पर शनि होने से शनि के लिए दी गई स्थिति मिलती है। केवल ग्रह की राशि जानने से यह तय नहीं होता कि वह इन स्थानों में से कहाँ है; कुंडली में पहचाने गए स्थान देखें।
कदम 3
टीकाकारों की दूसरी व्याख्या
टिप्पणी (f) के अनुसार कुछ टीकाकार नीचे के निश्चित त्रिकोण राशि-समूह लेते हैं। इसे ऊपर की स्थान-आधारित तालिका से अलग रखें।
| दिशा | राशि-समूह | बताए गए ग्रह |
|---|---|---|
| पूर्व | मेष, सिंह, धनु | बुध, गुरु |
| दक्षिण | वृषभ, कन्या, मकर | सूर्य, मंगल |
| पश्चिम | मिथुन, तुला, कुंभ | शनि |
| उत्तर | कर्क, वृश्चिक, मीन | चंद्रमा, शुक्र |
कदम 4
पहले तय करें कि कौन-सी व्याख्या पढ़ रहे हैं
मुख्य व्याख्या कुंडली के स्थान को देखती है। दूसरी व्याख्या यह देखती है कि राशि किस नामित समूह में आती है। दोनों को मिला देने पर लागू किया जा रहा नियम बदल जाएगा।
यह अंश इन वर्गों को बताता है; इससे भाव-गणना की पद्धति या दिग्बल के संख्यात्मक अंक तय नहीं होते।