Astro Auntyवैदिक ज्योतिष · स्मृति रूबी

थोड़ा पढ़ें, थोड़ा समझें।

11–20 / 38 गाइड

11नवांश कुंडली क्या है?नवांश में हर राशि के नौ बराबर भाग किए जाते हैं। जन्म कुंडली की स्थिति जिस भाग में आती है, उससे नवांश की राशि तय होती है।

हर राशि के नौ भाग

30 अंश की हर राशि को 3 अंश 20 कला के नौ नवांशों में बाँटा जाता है, इसलिए बारह राशियों में कुल 108 नवांश बनते हैं। अनुवादक बताते हैं कि 27 नक्षत्रों के चार-चार चरण भी 108 ही होते हैं। इसलिए एक नवांश एक नक्षत्र-चरण (पाद) के बराबर बैठता है।

गिनती कहाँ से शुरू होती है

नवांशों के नाम बारह राशियों के ही होते हैं, जो मेष की शुरुआत से बार-बार क्रम से गिने जाते हैं। इसी वजह से मेष, सिंह और धनु का पहला नवांश मेष होता है। वृषभ, कन्या और मकर का पहला नवांश मकर होता है। मिथुन, तुला और कुंभ का पहला नवांश तुला होता है। कर्क, वृश्चिक और मीन का पहला नवांश कर्क होता है।

एक उदाहरण

वृषभ में 5 अंश पर स्थित एक बिंदु लीजिए। वृषभ का पहला भाग (0 से 3 अंश 20 कला) मकर है और दूसरा भाग (3 अंश 20 कला से 6 अंश 40 कला) कुंभ है। इसलिए नवांश कुंडली में, जिसे आधुनिक सॉफ़्टवेयर अक्सर D9 कहते हैं, यह बिंदु कुंभ में रखा जाएगा। आकाश में कुछ नया नहीं देखा गया, बस उसी स्थिति को अलग ढंग से छाँटा गया।

खुद हिसाब लगाइए

अपनी किसी मौजूदा कुंडली से एक अंश चुनें और हाथ से उसका नवांश निकालें। हर भाग सिर्फ़ 3 अंश 20 कला चौड़ा होता है, इसलिए लिखे गए अंश में छोटी-सी गलती भी, जैसे जन्म-समय पक्का न होने से, नतीजे को अगली राशि में पहुँचा सकती है। सीमा के पास वाले बिंदुओं को सावधानी से देखें।

यह पारंपरिक गणना का परिचय है, विवाह की प्रमाणित भविष्यवाणी नहीं। Astro Aunty का निःशुल्क गुण मिलान चंद्रमा पर आधारित 36 में से अंक देता है; इससे नवांश, लग्न या पूरी जन्म कुंडली नहीं बनती।

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12किस राशि का स्वामी कौन है?परंपरा में बारहों राशियों में से हर एक का एक स्वामी ग्रह माना जाता है, और यह सूची जान लेने पर आप कुंडली में लिखी किसी भी राशि का स्वामी देख सकते हैं।

सात स्वामी ग्रह

बृहत् जातक में सात ग्रह राशियों के स्वामी हैं: सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, शुक्र, गुरु और शनि। सूर्य और चंद्र एक-एक राशि के स्वामी हैं, और बाकी पाँच ग्रह दो-दो राशियों के। इस तरह बारहों राशियाँ पूरी हो जाती हैं।

पूरी सूची

मंगल मेष और वृश्चिक का स्वामी है। शुक्र वृषभ और तुला का स्वामी है। बुध मिथुन और कन्या का स्वामी है। चंद्र कर्क का और सूर्य सिंह का स्वामी है। गुरु धनु और मीन का स्वामी है। शनि मकर और कुंभ का स्वामी है। अनुवादक किसी ग्रह की अपनी राशियों को उसका स्वक्षेत्र कहते हैं।

एक छोटा-सा उदाहरण

अगर रिपोर्ट में लिखा है कि चंद्र कन्या में है, तो उस राशि का स्वामी बुध है। अनुवादक की टिप्पणियों के अनुसार नवांश और द्वादशांश भागों के स्वामी भी यही होते हैं। इसलिए कुंभ नाम वाले नवांश का स्वामी भी शनि है।

अपना संदर्भ-चक्र बनाइए

मेष से शुरू करके बारह राशियाँ एक गोले में लिखिए और हर एक के आगे उसका स्वामी लिखिए। आपको एक दर्पण जैसा क्रम दिखेगा। कर्क और सिंह को बीच में रखें, तो बुध, शुक्र, मंगल, गुरु और शनि दोनों ओर एक ही क्रम में आते हैं।

स्वामित्व परंपरा का तय किया हुआ एक संबंध है, जिसका उपयोग राशि का स्वामी देखने के लिए होता है। यह कोई भविष्यवाणी नहीं है, और इससे कोई राशि किसी दूसरी से बेहतर या कमतर नहीं हो जाती। इस अंश में केवल ये सात ग्रह दिए गए हैं; राहु या केतु को कोई राशि नहीं दी गई है।

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13राशि क्या है?राशि, राशिचक्र के बारह बराबर 30-अंश वाले हिस्सों में से एक है; उससे जुड़ा पशु या चित्र उस हिस्से का पारंपरिक प्रतीक है।

माप से शुरुआत करें

राशिचक्र 360 अंश का एक वृत्त है, जिसे बारह बराबर राशियों में बाँटा जाता है। हर राशि 30 अंश की होती है। राशि का नाम बताता है कि आप कौन-सा हिस्सा देख रहे हैं और अंश बताते हैं कि उस हिस्से में कोई बिंदु कहाँ है। किसी स्थिति को समझने के लिए दोनों चाहिए।

राशियों का क्रम जानें

क्रम है: मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन। मीन के बाद गिनती फिर मेष से शुरू होती है।

प्रतीकों से नाम याद रखें

पारंपरिक चित्रों में मीन के लिए दो मछलियाँ, कुंभ के लिए घड़ा लिए एक व्यक्ति और मिथुन के लिए एक पुरुष व एक स्त्री दिखाए जाते हैं। इन चित्रों से नाम याद रखने में मदद ले सकते हैं। चित्र बदलने से राशि का आकार या उसकी सीमाएँ नहीं बदलतीं।

एक गणना करके देखें

मान लीजिए कोई बिंदु मेष की शुरुआत से 45 अंश पर है। पहले 30 अंश मेष के हैं। उन्हें घटाने पर 15 बचते हैं, इसलिए बिंदु वृषभ के 15 अंश पर है। ठीक 30 अंश पर वृषभ की शुरुआत 0 अंश से होती है। एक वृत्त बनाइए, हर 30 अंश पर निशान लगाइए और बारह राशियों के नाम क्रम से लिखिए।

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14नक्षत्र और चरण में क्या अंतर है?नक्षत्र, राशिचक्र के 27 बराबर हिस्सों में से एक है; उसके चार बराबर भागों में से हर भाग को चरण या पाद कहते हैं।

वृत्त को 27 से बाँटें

360 अंश को 27 से बाँटने पर हर नक्षत्र का विस्तार 13 अंश 20 कला निकलता है। यहाँ कला कोण की माप है: 60 कलाएँ मिलकर एक अंश बनाती हैं। क्रम मेष की शुरुआत में अश्विनी से शुरू होता है और मीन के अंत में रेवती पर पूरा होता है।

हर नक्षत्र को चार भागों में बाँटें

हर चरण 3 अंश 20 कला का होता है, क्योंकि 13°20′ ÷ 4 = 3°20′। पूरे वृत्त में 108 चरण और हर 30-अंश की राशि में नौ चरण आते हैं। ठीक सीमा पर आया अंश अगले चरण में गिनें। चौथे चरण के बाद अगला नक्षत्र अपने पहले चरण से शुरू होता है।

राशि और नक्षत्र का मेल देखें

हर राशि में सवा दो नक्षत्र आते हैं, इसलिए दोनों की शुरुआत हमेशा एक जगह नहीं होती। कृत्तिका का पहला चरण मेष में है, जबकि उसका दूसरा चरण वृषभ की शुरुआत पर आता है। इस तरह एक नक्षत्र दो राशियों में फैल सकता है।

एक उदाहरण हल करें

मेष के 18° पर चंद्रमा, अश्विनी के अंत से 4°40′ आगे, भरणी में है। भरणी की शुरुआत से गिनने पर दूसरा चरण 3°20′ से शुरू होकर 6°40′ से पहले तक रहता है। इसलिए यह भरणी का दूसरा चरण है। दूसरी राशि के लिए पहले मेष की शुरुआत से कुल अंश निकालें: वृषभ के 18° का मतलब 30° + 18° = 48° है। अब किसी दूसरी स्थिति पर यह तरीका आज़माएँ।

Astro Aunty का निःशुल्क गुण मिलान चंद्रमा पर आधारित 36 में से मूल अंक निकालता है; इससे पूरी जन्म कुंडली नहीं बनती।

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15कुंडली में होरा का क्या अर्थ है?इस पद्धति में होरा, किसी राशि के दो 15-अंश वाले भागों में से एक है, जिसे सूर्य या चंद्रमा से जोड़ा जाता है।

हर राशि के दो भाग करें

हर राशि 30 अंश की होती है। पहली होरा 0° से शुरू होकर 15° से पहले तक रहती है। दूसरी 15° से शुरू होकर 30° से पहले तक रहती है। ठीक 15° दूसरी होरा में आता है और 30° पर अगली राशि शुरू होती है। बारह राशियों में कुल 24 होरा भाग होते हैं।

विषम और सम राशियाँ पहचानें

मेष को पहली राशि मानकर गिनें। विषम राशियाँ हैं मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ। सम राशियाँ हैं वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन।

सूर्य और चंद्रमा का क्रम लगाएँ

विषम राशि में पहला भाग सूर्य की होरा और दूसरा भाग चंद्रमा की होरा है। सम राशि में क्रम उलट जाता है: पहले चंद्रमा, फिर सूर्य। होरा चुनने से पहले राशि का क्रमांक और उसके भीतर अंश, दोनों देखें।

दो उदाहरण जाँचें

सिंह के 20° पर कोई ग्रह विषम राशि के दूसरे भाग में है, इसलिए वह चंद्रमा की होरा में आता है। वृषभ के 10° पर कोई ग्रह सम राशि के पहले भाग में है, इसलिए वह भी चंद्रमा की होरा में है। अब किसी दूसरी राशि में कोई अंश चुनें और पहचानें कि वह सूर्य की होरा में है या चंद्रमा की।

यह गाइड राशि के दो होरा भागों के बारे में है। ग्रह-घंटों की गणना एक अलग विषय है।

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16द्रेष्काण के तीन भाग समझेंद्रेष्काण, किसी राशि के तीन 10-अंश वाले भागों में से एक है; इस पद्धति में हर भाग का स्वामी उसी राशि से आगे गिनकर तय किया जाता है।

हर राशि के तीन भाग करें

30 अंश की राशि के तीन भाग हैं: 0° से 10° से पहले तक, 10° से 20° से पहले तक, और 20° से 30° से पहले तक। ठीक सीमा पर आया अंश अगले भाग में गिनें; 30° पर अगली राशि शुरू होती है। बारह राशियों में कुल 36 द्रेष्काण होते हैं।

एक, पाँच और नौ गिनें

पहले भाग का स्वामी उसी राशि का स्वामी है। दूसरे भाग का स्वामी उससे पाँचवीं राशि का और तीसरे भाग का स्वामी उससे नौवीं राशि का स्वामी है। शुरुआती राशि को हमेशा पहली गिनें।

राशियों के स्वामी देखें

मेष और वृश्चिक के स्वामी मंगल हैं; वृषभ और तुला के शुक्र; मिथुन और कन्या के बुध। कर्क के स्वामी चंद्रमा और सिंह के सूर्य हैं। धनु और मीन के स्वामी बृहस्पति हैं; मकर और कुंभ के शनि।

एक उदाहरण हल करें

कन्या के 14° पर कोई बिंदु दूसरे भाग में आता है। कन्या को शामिल करके पाँच राशियाँ गिनें: कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर। मकर के स्वामी शनि हैं। तीसरे भाग के लिए कन्या से नौवीं राशि वृषभ है, जिसके स्वामी शुक्र हैं। अब मेष में कोई अंश चुनें: पहले उसका भाग पहचानें, फिर संबंधित राशि तक गिनें और उसका स्वामी देखें।

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17द्वादशांश को समझने की शुरुआतद्वादशांश में हर राशि के 2 अंश 30 कला वाले बारह भाग होते हैं; उनके नाम उसी राशि से शुरू होकर राशिचक्र के क्रम में चलते हैं।

हर भाग के अंश निकालें

30 अंश की राशि को बारह से बाँटने पर हर भाग 2½ अंश, यानी 2°30′, का होता है। पहला भाग 0°, दूसरा 2°30′ और तीसरा 5° पर शुरू होता है। ठीक सीमा पर आया अंश अगले भाग में गिनें। 30° पर अगली राशि शुरू होती है।

भागों के नाम क्रम से रखें

पहले भाग का नाम उसी राशि के नाम पर होता है। मेष में क्रम मेष, वृषभ, मिथुन से शुरू होकर मीन तक जाता है। वृषभ में क्रम वृषभ से शुरू होकर मेष पर पूरा होता है। हर राशि के लिए बारह भागों की गिनती नए सिरे से शुरू करें।

उसका स्वामी देखें

हर भाग का स्वामी उसी नाम की राशि का स्वामी होता है। जैसे धनु नाम वाले भाग के स्वामी बृहस्पति हैं। पहले भाग का क्रमांक और नाम निकालें, फिर उस राशि का स्वामी देखें।

एक उदाहरण हल करें

मिथुन के 17° लीजिए। 17 ÷ 2.5 = 6.8, यानी छह भाग पूरे हो चुके हैं और बिंदु सातवें भाग में है। यह भाग 15° से शुरू होकर 17°30′ से पहले तक रहता है। गिनें: मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु। सातवाँ भाग धनु है, जिसके स्वामी बृहस्पति हैं। अब कोई दूसरा अंश चुनकर गणना दोहराएँ और शुरुआती राशि को गिनती में शामिल करें।

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18किन भावों को केंद्र कहते हैं?पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव मिलकर केंद्र समूह बनाते हैं; इन उदाहरणों में हम हर पूरी राशि को एक भाव मानते हैं।

गिनती की शुरुआत तय करें

इन उदाहरणों में लग्न वाली राशि पहला भाव है और उसके बाद हर अगली राशि अगला भाव है। भाव बाँटने की दूसरी पद्धतियों में सीमाएँ अलग हो सकती हैं। भावों की गिनती लिखने से पहले लग्न वाली राशि चिह्नित करें।

उनके बीच का अंतर देखें

इस बराबर भागों वाले राशि-चक्र पर पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव एक-एक चौथाई वृत्त के अंतर पर हैं। पहले से तीन स्थान आगे चौथा, फिर सातवाँ और फिर दसवाँ आता है। तीन स्थान और बढ़ने पर फिर पहले पर पहुँचते हैं। इन्हें केंद्र या कोण कहा जाता है।

दूसरे नाम पहचानें

इसी समूह के लिए कंटक या चतुष्टय शब्द भी मिल सकते हैं। कुछ भावों के अपने दूसरे नाम हैं: चौथे को सुख, सातवें को जामित्र और दसवें को कर्म कहा जाता है। ये उन्हीं स्थानों के नाम हैं जिन्हें आपने गिना है; इनसे नए भाव नहीं जुड़ते।

एक उदाहरण हल करें

कर्क लग्न हो तो गिनें: कर्क 1, सिंह 2, कन्या 3, तुला 4। आगे गिनने पर मकर 7 और मेष 10 पर आते हैं। इसलिए केंद्र हैं कर्क, तुला, मकर और मेष। बारह राशियों का चक्र बनाएँ, इन चार स्थानों को चिह्नित करें और फिर किसी दूसरे लग्न से यही अभ्यास करें।

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19केंद्रों के बीच के भावबाकी आठ भाव दो समूहों में आते हैं: पणफर में 2, 5, 8 और 11; आपोक्लिम में 3, 6, 9 और 12।

हर केंद्र से एक भाव आगे बढ़ें

केंद्र भावों से शुरू करें: 1, 4, 7 और 10। हर केंद्र के ठीक बाद वाला भाव पणफर समूह में आता है। एक जोड़ने पर 2, 5, 8 और 11 मिलते हैं। भावों की गिनती में आगे बढ़ते रहें।

एक भाव और आगे बढ़ें

उनके बाद वाले भाव आपोक्लिम समूह बनाते हैं: 3, 6, 9 और 12। क्रम बार-बार केंद्र, पणफर, आपोक्लिम के रूप में आता है। बारहवें भाव के बाद फिर पहला भाव आता है, जो केंद्र है।

बारहों अंकों की जाँच करें

तीनों समूह अलग-अलग पंक्तियों में लिखें। उन्हें मिलाने पर 1 से 12 तक हर अंक ठीक एक बार आना चाहिए। जैसे 7 केंद्र है, 8 पणफर, 9 आपोक्लिम और 10 से यही क्रम फिर शुरू होता है। इससे तीन अलग सूचियाँ याद किए बिना भी अपनी गिनती जाँच सकते हैं।

उदाहरण में राशियों के नाम जोड़ें

यहाँ हर पूरी राशि को एक भाव मानें। तुला लग्न हो तो तुला पहला भाव है और हर अगली राशि अगला भाव है। पणफर में वृश्चिक, कुंभ, वृषभ और सिंह आएँगे। आपोक्लिम में धनु, मीन, मिथुन और कन्या आएँगे। पहले भावों के अंक लिखें, फिर चक्र पर हर समूह को अलग रंग दें।

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20राशि और भाव में क्या अंतर है?राशि, राशिचक्र के एक हिस्से का नाम है; यहाँ हर पूरी राशि को एक भाव मानकर, लग्न से उसकी भाव-संख्या गिनी गई है।

राशियों का क्रम वही रखें

बारह राशियों का क्रम मेष से मीन तक वही रहता है और हर राशि 30 अंश की होती है। वृषभ के 14 अंश पर कोई बिंदु उसी राशि और अंश पर रहेगा, चाहे भावों की गिनती किसी भी राशि से शुरू की जाए।

भाव गिनने का तरीका तय करें

इस उदाहरण में लग्न वाली पूरी राशि पहला भाव है। हर अगली पूरी राशि अगला भाव बनती है। इससे राशियों के सामने 1 से 12 तक भावों की संख्या लिख सकते हैं। भाव बाँटने की दूसरी पद्धतियों में सीमाएँ अलग हो सकती हैं, इसलिए रिपोर्ट में इस्तेमाल हुआ तरीका देखें।

एक राशि के अलग भाव-अंक देखें

अलग कुंडलियों में गिनती की शुरुआत अलग हो सकती है। जो राशि स्वयं लग्न होने पर पहला भाव है, वही उससे सामने वाली राशि लग्न होने पर सातवाँ भाव बनती है। राशि का नाम और भाव का अंक दो अलग बातें बताते हैं: राशिचक्र का कौन-सा हिस्सा और लग्न से गिनने पर कौन-सा स्थान।

एक उदाहरण हल करें

मकर लग्न हो तो मकर पहला भाव, कुंभ दूसरा, मीन तीसरा, मेष चौथा और कर्क सातवाँ भाव है। कर्क लग्न होने पर कर्क पहला और मकर सातवाँ भाव बन जाता है। राशियों का क्रम वही रखते हुए दोनों पूरी सूचियाँ साथ-साथ लिखें और उनके भाव-अंकों की तुलना करें।

Astro Aunty का निःशुल्क गुण मिलान चंद्रमा पर आधारित 36 में से मूल अंक निकालता है; यह भावों की गणना नहीं करता।

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