थोड़ा पढ़ें, थोड़ा समझें।
21–30 / 40 गाइड
21तिथि और कैलेंडर की तारीख में क्या अंतर है?तिथि, सूर्य से चंद्रमा की बढ़त में 12 अंश का बदलाव मापती है; यह आधी रात से अगली आधी रात तक की तारीख के अनुसार नहीं चलती।
चंद्रमा और सूर्य का अंतर निकालें
एक ही समय और एक ही राशि-पद्धति के लिए सूर्य और चंद्रमा की राशिचक्र में अंशों वाली स्थिति लें। चंद्रमा के अंशों में से सूर्य के अंश घटाएँ। परिणाम ऋणात्मक हो तो 360° जोड़ें। पूरे 360° पर गिनती फिर 0° से शुरू होती है।
12 अंश के हिस्से गिनें
हर तिथि 12° यानी 720 कला की होती है। कला कोण की माप है, घड़ी के मिनट की नहीं। ऐसे तीस हिस्से 360° का चक्र पूरा करते हैं। अंतर को 12 से भाग देकर पूरे हो चुके हिस्से गिनें; अगला हिस्सा वर्तमान तिथि है।
एक उदाहरण देखें
चंद्रमा 68° पर और सूर्य 42° पर हो तो अंतर 26° है। 12° के दो हिस्से पूरे हो चुके हैं और 2° शेष मिलते हैं, इसलिए यह तीसरी तिथि है। इसका विस्तार ठीक 24° से 36° से पहले तक है। 36° पर चौथी तिथि शुरू होती है।
समाप्ति का समय पढ़ें
एक ही तारीख के दौरान तिथि बदल सकती है। पंचांग में तिथि के समाप्त होने का समय और इस्तेमाल किया गया समय-क्षेत्र देखें। तारीख गिनने के तरीके की टिप्पणी भी पढ़ें, खासकर जब कोई प्रविष्टि आधी रात के बाद तक जाती हो।
22करण क्या है?करण, तिथि का आधा भाग है: सूर्य से चंद्रमा की बढ़त में 6 अंश का एक हिस्सा।
आधी तिथियाँ गिनें
चंद्रमा के राशिचक्र में अंशों से सूर्य के अंश घटाएँ। परिणाम ऋणात्मक हो तो 360° जोड़कर उसे 0° से 360° से कम के बीच रखें। अब 6 से भाग दें। तीस तिथियों के चक्र में आधी तिथि के 60 हिस्से होते हैं। ठीक 360° पर नया चक्र शुरू होता है।
नाम दोहराने का क्रम समझें
इन 60 हिस्सों के लिए ग्यारह नाम हैं। शुक्ल पक्ष की शुरुआत से गिनें। पहले हिस्से में एक स्थिर करण होता है। दूसरे से 57वें हिस्से तक बव से शुरू होने वाले सात नाम आठ बार दोहराते हैं। 58वें से 60वें हिस्से में बाकी तीन स्थिर करण आते हैं। इस तरह चार स्थिर करण चक्र के अंत और शुरुआत में बँटे हैं।
एक उदाहरण देखें
26° में 6° के चार हिस्से पूरे होते हैं और 2° अधिक बचते हैं, इसलिए यह पाँचवाँ हिस्सा है। यह तीसरी तिथि का पहला आधा भाग है। पूरी तीसरी तिथि 24° से 36° से पहले तक रहती है। उसका पहला आधा भाग 30° से पहले तक है; ठीक 30° पर दूसरा आधा भाग शुरू होता है।
नाम की सूची से मिलाएँ
बव दूसरे हिस्से से शुरू होता है, इसलिए पाँचवाँ हिस्सा चौथा चर करण है। उसका नाम पंचांग की सूची में देखें। क्रम जाँचते समय पहले और 58वें से 60वें हिस्सों को स्थिर तथा दूसरे से 57वें तक के हिस्सों को चर चिह्नित करें।
23पंचांग में योग का क्या अर्थ है?पंचांग का योग सूर्य और चंद्रमा की स्थितियाँ जोड़कर निकाला जाता है। यहाँ योग एक पंचांग माप है, व्यायाम या जन्म-कुंडली का ग्रह-योग नहीं।
दोनों स्थितियाँ जोड़ें
एक ही पंचांग से, एक ही समय के लिए सूर्य और चंद्रमा के निरयन अंश लें और उन्हें जोड़ें। जोड़ 360° या अधिक हो तो 360° घटाएँ; ठीक 360° का अर्थ फिर 0° है। दोनों स्थितियाँ एक ही राशि-पद्धति के अनुसार होनी चाहिए।
27 भागों में बाँटें
हर भाग 13°20′ यानी 800 कला का होता है। यहाँ कला कोण की माप है, घड़ी के मिनट की नहीं। कुल अंशों को कला में बदलकर 800 से भाग दें; इससे 13°20′ को दशमलव में अनुमान से लिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पूरे वृत्त में ऐसे 27 भाग हैं।
एक उदाहरण देखें
सूर्य के 100° और चंद्रमा के 150° जोड़ने पर 250° यानी 15,000′ मिलते हैं। 800 से भाग देने पर 18 पूरे भाग और 600′ शेष मिलते हैं। इसलिए वर्तमान योग 19वाँ है। ठीक 240° पर भी यही भाग शुरू होता है; ठीक 360° पर पहला योग फिर शुरू होता है।
पंचांग की प्रविष्टि पढ़ें
योग-सूची में उस क्रमांक का नाम देखें, फिर उसके समाप्त होने का समय और समय-क्षेत्र पढ़ें। भाग देने पर मिला शेष उस हिस्से में पार हो चुका कोण बताता है; वह घड़ी के बचे हुए मिनटों की संख्या नहीं है।
24सौर मास और चांद्र मास में क्या अंतर है?सौर मास सूर्य के एक राशि पार करने से बनता है और चांद्र मास 30 तिथियों से; इसलिए दोनों का एक साथ शुरू होना ज़रूरी नहीं है।
सौर मास: एक राशि
इस पारंपरिक गणना में सौर मास सूर्य के एक 30-अंश की राशि में प्रवेश से अगली राशि में प्रवेश तक चलता है। सूर्य किसी राशि में 15° पर हो तो अगले प्रवेश तक 15° और बाकी हैं। यह कोण की दूरी है, दिनों की संख्या नहीं।
चांद्र मास: तीस तिथियाँ
चांद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं। हर तिथि सूर्य से चंद्रमा की बढ़त में 12 अंश का हिस्सा है। यह बदलती स्थितियों से मापी जाती है, आधी रात से नहीं; इसलिए 30 तिथियों का मतलब कैलेंडर की 30 तारीखें नहीं है।
चांद्र मास का नाम पहचानें
कार्तिक जैसे नामों का नक्षत्रों से पारंपरिक संबंध है। कार्तिक का संबंध कृत्तिका से है। केवल महीने का नाम देखकर किसी खास तारीख पर चंद्रमा का सही नक्षत्र तय नहीं किया जा सकता; उसके लिए पंचांग की अलग नक्षत्र-प्रविष्टि पढ़ें।
शीर्षक साथ रखकर पढ़ें
मेष राशि से जुड़े सौर मास और कार्तिक जैसे चांद्र मास के शीर्षक की तुलना करें। देखें कि दोनों में क्या गिना जा रहा है। फिर जाँचें कि नीचे की संख्याएँ कैलेंडर की तारीखें हैं या तिथियाँ और महीने की शुरुआत का कौन-सा नियम दिया गया है।
25पारंपरिक दिन सूर्योदय से क्यों गिना जाता है?सूर्योदय से गिना जाने वाला सावन दिन एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है, जबकि आम कैलेंडर की तारीख आधी रात को बदलती है।
शुरुआत का समय पहचानें
इस पारंपरिक गणना में सूर्योदय पर नया दिन शुरू होता है और अगले सूर्योदय पर वह पूरा होता है। यह दिन की सीमा तय करने का एक तरीका है। इससे आपके फ़ोन या आम कैलेंडर में दिखाई गई तारीख नहीं बदलती।
आधी रात से तुलना करें
आधी रात से अगली आधी रात तक की तारीख और सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के समय का कुछ हिस्सा साझा होता है, पर दोनों की सीमाएँ अलग हैं। आधी रात के बाद के शुरुआती घंटे पिछले दिन के सूर्योदय से शुरू हुए समय के भीतर आ सकते हैं।
एक काल्पनिक उदाहरण देखें
मान लीजिए मंगलवार और बुधवार, दोनों दिन सूर्योदय सुबह 6:00 बजे है। बुधवार सुबह 3:00 बजे कैलेंडर में बुधवार होगा, लेकिन मंगलवार के सूर्योदय से शुरू हुआ समय अभी जारी रहेगा। ठीक बुधवार सुबह 6:00 बजे के सूर्योदय पर अगला दिन शुरू होगा। ये समय उदाहरण के लिए हैं; वास्तविक सूर्योदय तारीख और स्थान के साथ बदलता है।
पंचांग का स्थान देखें
किसी प्रविष्टि का अर्थ निकालने से पहले पढ़ें कि उस पंचांग में दिन कैसे गिना गया है और सूर्योदय किस स्थान का दिया है। समय-क्षेत्र भी देखें। तुलना करते समय छपी तारीख, सूर्योदय की सीमा और घटना के समय को अलग-अलग पहचानें।
26संक्रांति का क्या अर्थ है?संक्रांति वह क्षण है जब सूर्य अगली राशि में प्रवेश करता है; इस पारंपरिक गणना में उसी सीमा से अगला सौर मास शुरू होता है।
राशि-प्रवेश गिनें
राशिचक्र में 30 अंश की बारह राशियाँ हैं। एक पूरे चक्कर में सूर्य बारह बार नई राशि में प्रवेश करता है। प्रवेश पहचानने से पहले देखें कि कैलेंडर किस राशि-पद्धति का उपयोग करता है।
एक उदाहरण देखें
मीन के 29°59′ पर सूर्य मेष की सीमा से एक कला पीछे है। मेष के 0° पर पहुँचते ही मेष संक्रांति होती है। पूरे राशिचक्र में स्थिति 359°59′ से 360° पर आती है, जहाँ गिनती फिर 0° हो जाती है। ठीक सीमा मेष में आती है; यहाँ कला कोण की माप है, घड़ी का एक मिनट नहीं।
निरयन या सायन पद्धति देखें
निरयन और सायन पद्धतियों के शुरुआती बिंदु आज अलग हैं। दिसंबर का अयनांत सायन अंशों के 270° पर होता है। निरयन पंचांग में मकर संक्रांति के लिए निरयन राशि में प्रवेश देखा जाता है। इसलिए आज की मकर संक्रांति और दिसंबर के अयनांत की तारीख को एक न मानें।
दिया गया समय पढ़ें
अगले प्रवेश तक बाकी कोण जानने के लिए सूर्य का राशि के भीतर का अंश 30° में से घटाएँ। घड़ी का समय जानने के लिए उस वर्ष का कैलेंडर देखें और उसका समय-क्षेत्र व राशि-पद्धति जाँचें। हर साल एक ही तारीख मानने के बजाय प्रकाशित प्रवेश-समय का उपयोग करें।
27बृहत् जातक में ग्रह की दृष्टि कैसे गिनी जाती है?इस संस्करण की टिप्पणी ग्रह की सटीक अंश-स्थिति से कोण गिनकर दृष्टि समझाती है। जानें कि गिनती कहाँ से शुरू होती है, सामान्य दृष्टि कितनी मानी गई है और किन ग्रहों की विशेष पूर्ण दृष्टियाँ हैं।
ग्रह के अंश से गिनती शुरू करें
ग्रह की सटीक स्थिति को शुरुआती बिंदु A मानें। यही पहला स्थान है। फिर राशिचक्र के क्रम में हर 30° पर अगला स्थान गिनें। तीसरा स्थान A से 60° और सातवाँ 180° दूर होगा। इस विधि में गिनती ग्रह से शुरू होती है, लग्न से नहीं।
सामान्य दृष्टि के बिंदु देखें
श्लोक सात स्थानों के लिए दृष्टि की अलग-अलग मात्रा बताता है। यहाँ दृष्टि इन कोणों के लिए ग्रंथ में दिया गया वर्गीकरण है।
| ग्रह से स्थान | A से कोण | दृष्टि की मात्रा |
|---|---|---|
| तीसरा | 60° | ¼ |
| चौथा | 90° | ¾ |
| पाँचवाँ | 120° | ½ |
| सातवाँ | 180° | पूर्ण |
| आठवाँ | 210° | ¾ |
| नौवाँ | 240° | ½ |
| दसवाँ | 270° | ¼ |
विशेष पूर्ण दृष्टियाँ देखें
इन स्थानों पर सामान्य मात्रा की जगह पूर्ण दृष्टि मानी गई है। इन ग्रहों की सातवीं दृष्टि भी पूर्ण रहती है।
| ग्रह | ग्रह से स्थान | A से कोण |
|---|---|---|
| शनि | तीसरा और दसवाँ | 60° और 270° |
| गुरु | पाँचवाँ और नौवाँ | 120° और 240° |
| मंगल | चौथा और आठवाँ | 90° और 210° |
एक उदाहरण और उसकी सीमा
मान लें शनि मेष के 10° पर है। तब उसकी पूर्ण दृष्टि के केंद्र मिथुन के 10°, तुला के 10° और मकर के 10° होंगे। टिप्पणी हर केंद्र के दोनों ओर 15° की सीमा बताती है। तुला के 10° के लिए यह कन्या के 25° से तुला के 25° तक है। विशेष दृष्टियों के लिए भी यही सीमा दी गई है।
यह इस संस्करण की टिप्पणी में दी गई कोण-आधारित पद्धति है। दृष्टि की मात्रा और सीमा पारंपरिक कुंडली के नियम हैं, किसी भौतिक प्रभाव का माप नहीं।
28नैसर्गिक ग्रह-संबंधों की तालिका कैसे पढ़ें?बृहत् जातक सत्याचार्य की बताई एक निश्चित तालिका अपनाता है। इसमें मित्र, सम यानी तटस्थ, और शत्रु—ये एक ग्रह के दूसरे ग्रह से संबंध के तकनीकी नाम हैं।
संदर्भ ग्रह की पंक्ति पढ़ें
पहले कॉलम में वह ग्रह चुनें जिससे संबंध देखना है। फिर उसी पंक्ति में दूसरे ग्रह का नाम खोजें। हर पंक्ति में बाकी छह ग्रह दिए गए हैं; ग्रह का स्वयं से संबंध शामिल नहीं है।
| संदर्भ ग्रह | मित्र | सम / तटस्थ | शत्रु |
|---|---|---|---|
| सूर्य | चंद्रमा, मंगल, गुरु | बुध | शुक्र, शनि |
| चंद्रमा | सूर्य, बुध | मंगल, गुरु, शुक्र, शनि | कोई नहीं |
| मंगल | सूर्य, चंद्रमा, गुरु | शुक्र, शनि | बुध |
| बुध | सूर्य, शुक्र | मंगल, गुरु, शनि | चंद्रमा |
| गुरु | सूर्य, चंद्रमा, मंगल | शनि | बुध, शुक्र |
| शुक्र | बुध, शनि | मंगल, गुरु | सूर्य, चंद्रमा |
| शनि | शुक्र, बुध | गुरु | सूर्य, चंद्रमा, मंगल |
उलटी दिशा अलग से देखें
चंद्रमा की पंक्ति में बुध मित्र है। लेकिन बुध की पंक्ति में चंद्रमा शत्रु है। दोनों बार संदर्भ ग्रह अलग है, इसलिए संबंध दोनों दिशाओं में एक जैसा होना ज़रूरी नहीं।
इसे कुंडली की स्थिति से अलग रखें
इस पद्धति में नैसर्गिक संबंधों की तालिका निश्चित रहती है। तात्कालिक संबंध अलग नियम से देखा जाता है, जो कुंडली में ग्रहों की एक-दूसरे से स्थिति पर निर्भर करता है।
श्लोक 15 में एक अन्य मत भी दिया गया है। इस गाइड में श्लोक 16–17 में अपनाई गई सत्याचार्य की तालिका का उपयोग किया गया है।
29तात्कालिक ग्रह-मित्रता: किस ग्रह से गिनें?तात्कालिक संबंध इस बात पर निर्भर करता है कि एक ग्रह दूसरे से किस स्थान पर है। नैसर्गिक तालिका के विपरीत, ग्रहों की आपसी स्थिति बदलने पर यह वर्गीकरण बदल सकता है।
गिनती का शुरुआती स्थान चुनें
जिस ग्रह से संबंध देखना है, उसके स्थान को पहला मानें। अगला स्थान दूसरा होगा, और इसी तरह बारह तक गिनें। गिनती उस ग्रह से शुरू करें, अपने-आप लग्न से नहीं। नीचे के उदाहरण में केवल क्रमांक वाले स्थान लिए गए हैं; कोई भाव-गणना पद्धति तय नहीं की गई है।
मित्रता वाले छह स्थान देखें
श्लोक के मुख्य नियम में दूसरे, तीसरे, चौथे, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें स्थान पर मौजूद अन्य ग्रह संदर्भ ग्रह के तात्कालिक मित्र हैं। बाकी स्थानों के ग्रह तात्कालिक शत्रु की श्रेणी में आते हैं।
क्रमांक से एक उदाहरण
गुरु को संदर्भ ग्रह मानें। यदि शुक्र गुरु से दूसरे स्थान पर है, तो वह गुरु का तात्कालिक मित्र है। गुरु से सातवें स्थान पर मौजूद शनि उसका तात्कालिक शत्रु होगा। दोनों संबंध अलग-अलग देखे गए हैं और दोनों की गिनती गुरु से शुरू हुई है।
दोनों तरह के संबंध अलग लिखें
नैसर्गिक तालिका में गुरु की पंक्ति शुक्र को शत्रु बताती है। लेकिन दूसरे स्थान वाले उदाहरण में शुक्र तात्कालिक मित्र है। दोनों बातें साथ लिखी जा सकती हैं: एक निश्चित तालिका से मिली है और दूसरी ग्रहों की आपसी स्थिति से।
श्लोक 18 में कुछ आचार्यों का एक अतिरिक्त मत भी है, जो उच्च राशि से मित्रता जोड़ता है। वह ऊपर समझाए गए छह-स्थान वाले मुख्य नियम में शामिल नहीं है।
30स्थान बल: पाँच अलग स्थितियों को समझेंइस अंश में स्थान बल ग्रह की स्थिति का एक पारंपरिक वर्गीकरण है, जिसके लिए पाँच नाम दिए गए हैं। स्वराशि और स्वनवांश इस सूची में अलग-अलग स्थितियाँ हैं।
पाँच शब्द पहचानें
श्लोक 19 इन स्थितियों के नाम देता है, लेकिन इनके लिए कोई संख्यात्मक अंक नहीं देता।
| शब्द | किस स्थिति का नाम है |
|---|---|
| उच्च राशि | उस ग्रह के लिए निर्धारित उच्च राशि। |
| मित्र राशि | अपनाए गए ग्रह-संबंध नियमों के अनुसार उस ग्रह की मित्र मानी गई राशि। |
| मूलत्रिकोण | ग्रंथ में अलग से नामित राशि-श्रेणी। |
| स्वनवांश | ऐसा नवांश जिसकी राशि का स्वामी वही ग्रह हो। |
| स्वराशि / स्वक्षेत्र | वह राशि जिसका स्वामी स्वयं वह ग्रह हो। |
स्वराशि और स्वनवांश अलग देखें
स्वराशि ग्रह की राशि-स्थिति से संबंधित है। स्वनवांश उसकी निकाली गई नवांश-स्थिति से। अध्याय 1 की टिप्पणियाँ राशियों और उन्हीं नामों वाले नवांशों के स्वामी समान बताती हैं। इसलिए सिंह नाम का नवांश सूर्य का है। हर ग्रह की कोई नवांश-स्थिति होती है; स्वनवांश तभी होगा जब उस नवांश का स्वामी वही ग्रह हो।
एक ही राशि के दो नामित संबंध
अध्याय 2 की टिप्पणियाँ मेष को सूर्य की उच्च राशि और सिंह को उसका मूलत्रिकोण बताती हैं। सूर्य को सिंह का स्वामी भी बताया गया है। इससे समझ आता है कि मूलत्रिकोण और स्वराशि अलग नाम हैं, भले ही ग्रंथ किसी ग्रह के लिए दोनों में एक ही राशि बताए।
हर नाम का आधार दर्ज करें
कुंडली के किसी ग्रह के लिए उसकी राशि, राशि का स्वामी और नवांश अलग-अलग लिखें। कोई अन्य नाम जोड़ने पर यह भी देखें कि वह किस स्रोत या संबंध-नियम से मिला है। टिप्पणियाँ सापेक्ष मानों के लिए अन्य स्थान का संदर्भ देती हैं; केवल इन पाँच नामों से अंक जोड़ने या क्रम तय करने का नियम नहीं मिलता।
यह गाइड इन अंशों में दिए गए वर्गीकरण समझाती है। इससे ग्रह के पूरे बल का संख्यात्मक हिसाब नहीं निकलता।